गौतम विश्वकर्मा जी द्वारा रचित प्रेम - विरह (दोहा)

गौतम विश्वकर्मा जी द्वारा रचित प्रेम  - विरह (दोहा)
मन बहके गलियन बीच, गोरी करे पुकार।
दिल खोले बैठी पिया, आ जाओ एक बार।।

कवि- गौतम विश्वकर्मा, सुकृत-सोनभद्र (उत्तर प्रदेश)

1. शाब्दिक अर्थ:
गोरी गलियों के बीच में मन के बहकने से अपने पिया को पुकार रही है कि मैंने दिल का दरवाजा खोल रखा है, एक बार आ जाओ।

2. भावार्थ (विरह का अर्थ):
यह सिर्फ पुकार नहीं, एक इंतजार है। जब प्रेम सच्चा होता है तो राहें भी सूनी लगती हैं। गोरी का दिल खुला है, मतलब उसने सारी दुनिया के लिए दरवाजा बंद कर सिर्फ एक के लिए खोला है।

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