पुरुष का प्रेम (कविता)
वो कम बोलता है, पर बहुत कुछ कहता है,
उसकी खामोशी में भी एक समंदर रहता है।
शब्दों में नहीं ढल पाता हर एहसास उसका,
पर हर दर्द में वो सबसे आगे खड़ा रहता है।
वो फूल नहीं देता हर रोज़ हाथों में,
पर काँटों से रास्ते तुम्हारे साफ़ करता है।
अपनी थकान छुपाकर मुस्कुराता है यूँ,
जैसे खुद से ज़्यादा तुम्हें वो चाहता है।
उसका प्यार शोर नहीं करता दुनिया में,
वो चुपचाप जिम्मेदारियों में ढल जाता है।
अपने हिस्से की धूप खुद सह लेता है,
ताकि तुम्हारे आँगन में साया बन जाता है।
पुरुष का प्रेम अक्सर दिखता नहीं है,
पर हर गिरती दीवार में सहारा बनता है।
वो कहे या ना कहे “मैं तुमसे प्यार करता हूँ”,
उसका हर कर्म ही इज़हार बनता है।
- मनीषा जायसवाल
कोलकाता