"रंगभरी एकादशी” का पौराणिक, धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा
रंगभरी का मतलब”रंगों से भरा हुआ”रंगभरी एकादशी फागुन मास के शुक्ल पक्ष के एकादशी तिथि को,यह धार्मिक पर्व मनाया जाता है।इसे आमलकी एकादशी भी कहते हैं।इसको एक नाम”रंगभरणी एकादशी” के नाम से भी पुकारा जाता है।कहा जाता है कि इस दिन भगवान शिव ने माता पार्वती के साथ पहली बार होली खेली थी।दूसरी लोक मान्यता के अनुसार इस दिवस को बाबा विश्वनाथ ने हिमालय की पुत्री गौरा का गौना कराकर अपने वास स्थान काशी में पधारे थे तभी से यह पर्व धूम धाम से काशी में मनाया जाता है।जनश्रुति यह भी है कि शिवा व शिव होली खेलकर काशी भ्रमण पर भी निकले थे;उसी की याद में शिव व शिवा की प्रतिमाओं के साथ लोग नगर भ्रमण करते हैं विशाल शोभा यात्रा निकालकर लोग एक दूसरे को अबीर गुलाल लगाकर रंगभरी एकादशी का पर्व मनाते हैं।काशी में इसी दिन से होली का उत्सवी माहौल और होली का त्योहार शुरू हो जाता है।यह काशी में छ दिन तक मनाया जाता है ।आध्यात्मिक दृष्टि से आनंद और मिलन का यह पर्व है। बसन्त ऋतु के आगमन का भी प्रतीक माना गया है,जब सर्दी से आमजनमानस को निजात मिलती है और शारीरिक व मानसिक प्रसन्नता प्राप्त होती है।
वैसे तो एकादशी का व्रत, भगवान विष्णु को समर्पित माना गया है क्योंकि उन्होंने मूर नामक असुर का वध एकादशी के दिन ही किया था जो देवताओं पर आक्रमण किया करता था।परन्तु एक एकादशी जिसे रंगभरी एकादशी कहा जाता है जो शिव और पार्वती जी को समर्पित होता है।इस दिन व्रत रखने से दाम्पत्य जीवन में सुख,अखण्ड सौभाग्य और खुशहाली आती है।कारण यही है कि विवाहित महिलाएँ इस दिन अपने वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाने के निमित्त व्रत रखकर शिव और पार्वती से प्रार्थना करती हैं कि जीवन सुखमय व्यतीत हो।इस दिन अविवाहित महिलाएँ भी अपने अच्छे जीवन साथी के लिए इस व्रत को रखती हैं।drik panchang के अनुसार
रंगभरी एकादशी का व्रत इस वर्ष २७ फ़रवरी को रात १२ बजकर ३३ मिनट से शुरू होकर उसी रात १० बजकर ३२ मिनट तक मनाया जाएगा।व्रती लोग दिनांक २६ फ़रवरी को सायं से ही तामसिक भोजन का परित्याग कर सात्विक भोजन ग्रहण कर अगले दिन स्नान कर माँ पार्वती व भोले नाथ का जलाभिषेक कर उन्हें बेलपत्री ,पीले फूल,तुलसी दल, धूप दीप अर्पित कर”ॐ गौरी शंकराय नमः”का जाप कर,उनकी पूजा आराधना करते हैं।तुलसी दल चढ़ाते समय निम्न मंत्र का जाप किया जाता है वह है” ॐ महा प्रसाद जननी सर्व सौभाग्य दायिनी आधि व्याधि हरा नित्यं तुलसी त्वम् नमस्तुते “।इस दिन साधक सात्विक आहार लेते हैं। इस दिन गेहूं जौ चना मकई(मक्का)सादा नमक लहसुन प्याज पत्तेदार सब्ज़ियों पालक गोभी बैगन का सेवन नहीं करते।व्रत के दौरान दिन में लोग नहीं सोते बाल नहीं कटवाते नाखून भी नहीं काटते तेल साबुन का इस्तेमाल नहीं करते और किसी नशीले पदार्थों का सेवन भी नहीं करते जिसमें चाय काफ़ी निकोटिन गाँजा भांग शराब बीड़ी सिगरेट इत्यादि वर्जित किया गया है।व्रत के दौरान झूठ बोलना, क्रोध करना, कोई बुरा काम करना,किसी की निंदा करना, चोरी करना, हिंसा करने की शख्त मनाही होती है; अन्यथा व्रत खंडित हो जाता है और उसका फल व्रती को नहीं मिलता।व्रत का पारण दिनांक २८ फ़रवरी को ६ बजकर ४७ मिनट से शुरू कर ९ बजकर ६ मिनट के बीच संपन्न होगा।का लाभ तो इंद्रियों और मन को संयमित रखने पर ही मिलता है।इस दिन अन्न का दान सबसे अच्छा माना जाता है लेकिन किसी से अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए।एकादशी के दिन फलाहार ग्रहण करना,दूध दही कट्टू का आटा, सिंगाड़े का हलवा,आलू, शकरकंद, साबूदाना खा सकते हैं।
एकादशी के दिन चावल खाने की मनाही होती है क्योंकि मान्यता है कि चावल में समस्त पाप इस दिन समा जाता है। आयुर्वेद के अनुसार चावल में जल की मात्रा अधिक होने के कारण इसके खाने से आलस्य व भारीपन होता है जो आध्यात्मिक साधना के लिए उचित नहीं होता, शायद इसी वजह से पद्म पुराण और विष्णु पुराण में उल्लिखित है कि एकादशी के दिन चावल नहीं खाना चाहिए।
धार्मिक और पौराणिक एक कथा के अनुसार महर्षि मेधा ने मां के क्रोध से बचने के लिए अपने शरीर का त्याग एकादशी के दिन कर दिया और उनका अंश पृथ्वी में समा गया जो चावल और जौ के रूप में पैदा होता है, इस कारण से भी भक्त लोग इस दिन चावल नहीं खाते।
संक्षेप में यदि इस व्रत के महात्म्य को समझा जाए तो
१-गौना कराकर प्रथम बार भोले नाथ का पार्वती के संग काशी आगमन और अपने गणों के साथ होली खेलना।इसीलिए यह भोले बाबा का क्रीड़ा का पर्व भी कहा जाता है।गौरी पूजा से अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
२-काशी में होली की शुरुआत भी इसी दिन से होती है और छ दिन तक चलती है।
३-बाबा विश्वनाथ का विशेष श्रृंगार। इस दिन बाबा को दूल्हे के रूप में सजा कर गौरा पार्वती के साथ रंग गुलाल के साथ होली खेली जाती है,जिससे जीवन में विशेष ऊर्जा का संचार होता है।जीवन में सकारात्मकता आती है।इस दिन भक्तों द्वारा विशाल शोभा यात्रा निकाली जाती है।
४- इस दिवस को आमलकी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन संयुक्त रूप से शिव,पार्वती और भगवान विष्णु की पूजा का विधान किया जाता है, जिससे स्वास्थ्य, धन और सुख की प्राप्ति होती है। आंवले के वृक्ष की पूजा से पापों से मुक्ति मिलती है।
५- मोक्ष व सुख समृद्धि की प्राप्ति, इस दिन की पूजा सुख समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति के लिए भी शुभ होती है।काशी को मोक्ष दायिनी नगरी के रूप में भी मान्यता प्राप्त है।
लेखक : मोटिवेशनल स्पीकर, वरिष्ठ प्रशिक्षक/साहित्यकार कई पुस्तकों के प्रणयनकर्ता, कई राज्यस्तरीय पुरस्कारों से विभूषित, शिक्षाविद एवं प्रथम श्रेणी का पूर्व अधिकारी है।
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संपादकीय/रंगभरी एकादशी