संकल्पित मन (कविता)

संकल्पित मन 
दृढ़ प्रतिज्ञ हो, संकल्पित मन।
निष्कंटक हो जीवन कानन।।

पीड़ा दुःख अभाव जब आये।
जीवन फिर भी, ना घबराये।।
लें संतोष का,अप्रतिम सहारा,
सुख का होवे चमन,,,,,

जिसने भी है धैर्य संजोया।
कभी नहीं वो कुछ भी खोया।।
जो सीमित संकीर्ण हुआ तो,
दुःख पाया है तन,,,,,

चलता वही सफलता पथ पर।
श्रम से नाता जोड़ा जब तक।।
जग में वही सुकीर्ति पाया, 
जिसका शुद्ध रहा चेतन,,,,,

वाणी को जो मधुर बनाया।
संघर्षों को दूर भगाया।।
जीवन में मिलता है उसको, 
सुख के साथ अमन,,,,,

सच्ची लगन व रही एकाग्रता।
मिलती नहीं उसे विफलता ।।
लक्ष्य साधकर कर आगे बढ़ना,
ना कोई अनबन।

सार्थक जीवन यदि हो पाना।
निंदा से तुम मत घबराना ।।
असफलता से अपमानित न हो, 
न मालिन्य आनन।

छिपी निधि है, कहीं अगम में।
पाना है यदि इस जीवन में।।
सृजन से मिलती है समृद्धि,
करें कर्म बंधन।

रचनाकार: डॉक्टर डी आर विश्वकर्मा, वाराणसी

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