नियम, नैतिकता व कानून से भटकी वैश्विक बिरादरी आज युद्ध के मुहाने पर : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा
मित्रों! कोई भी देश नियम, मूल्यों व कानून और मान्य सार्वभौमिक विदेश नीति जिसमें सभी देशों की संप्रभुता का सम्मान, उपनिवेशवाद की समाप्ति, साम्राज्य वाद पर रोक, अहत्क्षेपवाद, बहुपक्षवाद, गुट निरपेक्षता का सिद्धांत और रंगभेद नीति का विरोध आदि से चलता है।विश्व में शांति और सुरक्षा बनाये रखना, वैश्विक मुद्दों पर सहयोग और समन्वय के लिए काम करना और आर्थिक विकास को बढ़ावा देना, मानवाधिकारों की रक्षा और पर्यावरण संरक्षण करना ग़ैर क़ानूनी गतिरोधों को समाप्त करना ,युद्ध और युद्ध अपराध न करना,परमाणु अप्रसार की नीति भी इसमें शामिल है।परन्तु आज कुछ देशों के तुगलकी फरमान के कारण नियम,नैतिकता व क़ानून का उल्लंघन वैश्विक तन्त्र की नींव को कमज़ोर कर रहा है फलस्वरूप वैश्विक समुदाय जंगल राज व मत्स्य न्याय के पथ पर अग्रसर हो रहा है।उदाहरण चार साल से जारी रूस यूक्रेन युद्ध,दो साल से चल रहा गाजा नरसंहार,वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी और बिना अंतर्राष्ट्रीय सहमति और अनुमति के मनमाना टारिफ़ लगाना और अब ईरान पर जबरदस्ती युद्ध थोपने की साज़िश(यद्यपि हो सकता है ईरान कुछ मामले में दोषी हो परन्तु उसे बातचीत के माध्यम से सुलझाया जा सकता था।)नेआज पूरी दुनिया को अनावश्यक परेशान कर रखा है।जब की कहीं कहीं जातीय संघर्ष प्राकृतिक आपदाएं वैश्विक आर्थिक असंतुलन डीडालराइज़ेशन की चुनौती पर्यावरणीय संकट,जलवायु परिवर्तन,वायु प्रदूषण,जल संकट,जैव विविधता का नुकसान,कुछ प्रजातियों के विलुप्तीकरण इत्यादि गंभीर समस्याओं से विश्व के तमाम देश जूझ रहे हैं|इन वैश्विक समस्याओं का निदान कोई एक देश नहीं कर सकता।इन ज्वलंत वैश्विक समस्याओं के हल हेतु सभी देशों को एक जुट होकर,सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा;तभी इन समस्याओं पर हम विजय प्राप्त कर सकते हैं।परन्तु आज कुछ देशों के वर्चस्व वादी नीति के कारण वैश्विक मंच पर युद्ध और दादागिरी की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। आज कुछ देश मूल्य और सिद्धांतों को छोड़कर अपनी हेकड़ई दिखा रहे हैं। कारण साफ़ है कि वे अपने यहाँ भू राजनीतिक बहस और चुनिंदा आलोचनाएं कर चुनाव जीत जाए।वे अन्य देशों की नियम आधारित शासकीय संरचना को बल प्रयोग से तबाह करने की भी कोशिश कर रहें हैं,जो कदापि न्यायोचित नहीं है।आज वैश्विक समस्याओं से निपटने के लिए सामूहिक समाधान की आवश्यकता है;परन्तु कुछ बड़े देश सद्भावी संवाद के बिना अपने मनमानेपन व संकीर्ण सोच के कारण पूरी वैश्विक व्यवस्था की विश्वसनीयता में पलीता लगा रहे हैं।
हमें आज समझना होगा कि अब विश्व दो ध्रुवीय शक्ति का केन्द्र नहीं रहा।वैश्विक शक्ति अब बहुध्रुवीय हो चुकी है,जिसमें भारत, ब्राज़ील,जापान इत्यादि देश आज अंतर्राष्ट्रीय भूमिका को निभाने में सक्षम हुए हैं,जिन्हें बीटो पॉवर भी दिया जाना चाहिए ताकि वैश्विक बिरादरी की समस्याओं का पारदर्शिता के साथ समाधान हो सके।
द्वितीय विश्व युद्ध(1939-45) की विभीषिका के बाद वैश्विक शांति,आर्थिक पुनर्निर्माण,मानवाधिकारों की रक्षा और मानवीय सहायता के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण अन्तर्सरकारी और ग़ैर सरकारी संगठनों की स्थापना की गई;जिसमें विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की स्थापना 1944 में हुई जो विकासशील देशों के बुनियादी ढाँचे को मजबूत बनाने हेतु दीर्घकालीन ऋण और मौद्रिक स्थिरता सुनिश्चित करने के निमित्त बनाया गया था ।यूनेस्को की स्थापना 1945 में किया गया जिससे शिक्षा विज्ञान और संस्कृति के माध्यम से विश्व शांति की स्थापना हो सके।बच्चों को आपातकालीन भोजन एवं स्वास्थ्य देखभाल के लिए यूनिसेफ़ की स्थापना 1946 में किया गया।संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना 1945 में हुई,जो वैश्विक शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अस्तित्व में लाया गया।कृषि एवं खाद्य सुरक्षा संगठन-कृषि एवं खाद्य से सम्बन्धित अंतर्राष्ट्रीय नीतिओं को विकसित करने और भुखमरी और कुपोषण को समाप्त करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और उपयोग को बढ़ावा देने हेतु इसकी स्थापना की गई ।विश्व स्वास्थ्य संगठन 1948 में बना जो वैश्विक स्वास्थ्य मुद्दों पर कार्य करने हेतु वैश्विक संस्था के रूप में मान्यता प्राप्त है।एस ओ एस चिल्ड्रेन विलेज 1949 में युद्ध में अनाथ हुए बच्चों को आश्रय देने के लिए बनाया गया।अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी 1957 में परमाणु ऊर्जा को शांति पूर्ण तरीके से संचालित करने तथा परमाणु अस्त्रों के प्रसार पर रोक हेतु यह अस्तित्व में आया। मानवाधिकारों की रक्षा हेतु 1961 में एमेनेस्टी इंटरनेशनल संस्था की स्थापना हुई जो दुनिया भर के कैदियों शरणार्थियों शोषित लोगों के मानवाधिकार की रक्षा हेतु समर्पित संस्था है।विश्व व्यापार संगठन की स्थापना 1995 में इस उद्देश्य से किया गया कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा मिले और विश्व व्यापार नियमन में कोई कठिनाई न आने पाए।उक्त अनेकानेक ग़ैर सरकारी संगठन और अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का निर्माण केवल इस उद्देश्य से किया गया,जिससे वैश्विक सुख,शांति कायम रह सके परन्तु आज कुछ देशों की दादागिरी के चलते पूरी दुनिया युद्ध के मुहानों पर पहुँच चुकी है।कारण उक्त वैश्विक संस्थाओं के काम काज पर कुछ देशों द्वारा अनावश्यक दबाव बनाया जाना और विश्व बिरादरी द्वारा सही को सही और गलत को गलत ना कहने की हिम्मत का अभाव;आज विश्व को युद्ध के मुहाने पर और परमाणु युद्ध की ओर धकेल दिया है।होना तो यह चाहिए कि किसी भी समस्या का हल कूटनीतिक तरीके से बात चीत के माध्यम से समाधान खोजने की जरूरत आज वैश्विक स्थिरता बनाये रखने हेतु अत्यन्त आवश्यक है।इसके लिए सभी देशों की सामूहिक ज़िम्मेदारी है परन्तु आज संयुक्त राष्ट्र संघ की चेतावनी अरण्य रोदन के समान हो गयी है क्योंकि शक्तिशाली देश अपने रणनीतिक हितों के के अनुसार काम करते हैं और वैश्विक अपीलों को दर किनार करते हुए अपनी दादागिरी दिखाते हैं जिससे उक्त वैश्विक संस्थाओं की प्रासंगिकता और विश्वसनीयता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
उक्त वैश्विक संस्थाओं की स्थापना इन्हीं उद्देश्यों को रख कर की गई थी कि विश्व के सभी देश इन संघों के न्यायोचित आदेशों का पालन करेंगे,जिससे किसी भी प्रकार की समस्या का समाधान हो सके।परन्तु आज देखने को मिल रहा है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस की आवाज बुलन्द हो गई है।ये संस्थाएं जो कभी सभी देशों की आशा और अपेक्षाओं पर खरे उतरते थे अब प्राणहीन और अनुपयोगी होने लगे हैं।जैसे संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थिति हो गई है ।सबसे ज़्यादा नुकसान हासिए पर रहने वाले देशों की हो रही है जहाँ गरीबी,भुखमरी,कुपोषण और बाढ सूखा से निपटने की तत्काल ज़रूरत है परन्तु आज अंतर्राष्ट्रीय संधियों और न्यायाधिकरण के बावजूद भी ऐसे देश कुछ देशों के मनमानेपन के शिकार हो रहे हैं।उनकी न्यायोचित मांगे भी पूरी नहीं हो पा रही हैं और उनपर भी ज़बरदस्ती कुछ देश अपनी दादागिरी दिखा रहे हैं और उन्हें शांति सहअस्तित्व के साथ रहने नहीं दे रहे हैं।
अब समय आ गया है कि हम सभी देश महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों पर चलें।भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को आत्मसात करें और पंच शील के उनके सिद्धांतों को अमल में लाएं, जिससे सबकी उन्नति हो।लोगों में पाप कर्मों की समाप्ति हो और जीवन से अहिंसा अचौर्य व्यभिचार समाप्त हो और सत्यवादिता का मार्ग प्रशस्त हो। आज वैश्विक स्तर पर नशा पान की आदतें, अत्याचार, अनाचार, पापाचार, लोगों में घर कर रही है,फलस्वरूप लोगों में अनैतिक गतिविधियों और व्यभिचार को बढ़ावा मिल रहा है।परिणाम स्वरूप लोगों में आपसी विश्वास,भाईचारे की समाप्ति,धार्मिक उन्माद देखने को मिल रहा है।ऐसे में हमारे आर्ष ऋषियों की वाणी और उनके प्रतिपादित सिद्धांत के मार्ग का अनुसरण करने पर ही सभी नागरिकों का जीवन सुखमय हो सकता है।हमारे ऋषियों का चिंतन है कि व्यक्ति का सही विकास ही समष्टि का विकास है।यही वजह है कि आज युद्ध नहीं बल्कि बुद्ध की शिक्षाओं को अपनाने की जरूरत है,जिससे वैश्विक सुख,शांति को बढ़ावा मिल सके और सभी का जीवन शांतिमय हो सके।
सर्वे भवन्तु सुखिनःसर्वे संतु निरामया|
सर्वे भद्राणी पश्यंतु,मा कश्चिद दुख भागभवेत।।
और ऋषि परम्परा में तो यह भी कहा गया है कि,”अयम निज:परो
वेति गणना लघु चेतशाम।उदार चरितनाम तो वसुधैव कुटुंबकम्।।
लेखक:कई पुस्तकों का प्रणयन कर्ता कई राज्य स्तरीय सम्मानों से विभूषित वरिष्ठ साहित्यकार, शिक्षाविद, वार्ताकार, वरिष्ठ प्रशिक्षक और प्रथम श्रेणी का पूर्व अधिकारी रह चुका है।