विश्वकर्मा कुल;समुदाय अपना विलुप्त सांस्कृतिक गौरव, कैसे प्राप्त करें : डॉक्टर डी आर विश्वकर्मा

विश्वकर्मा कुल;समुदाय अपना विलुप्त सांस्कृतिक गौरव, कैसे प्राप्त करें :  डॉक्टर डी आर विश्वकर्मा
यह हम सभी को ज्ञात ही हो चुका है कि हमारी उच्च कोटि की सांस्कृतिक विरासत को समय समय पर विभिन्न काल खंडों में दबाने की पुरज़ोर कोशिश की गई,तभी तो आज हम सांस्कृतिक उच्चता में निचले पायदान पर खिसककर आ गये।वर्चस्ववादी ताक़तों ने अपनी पूरी ताक़त लगाकर हमारे उज्ज्वल इतिहास को मटियामेट करने की पूरी कोशिश की,जिससे आदि सृष्टि कर्ता भगवान विश्वकर्मा जो परम पुरुष,विश्व देव परम ब्रह्म हैं ,उन्हें केवल शिल्पचार्य निर्माण के देवता तक सीमित कर दिया गया,परन्तु इस कमी में अपने कुल का दोष कम नहीं।भाइयों हमने अपने कुल को और उज्ज्वल करने का कभी प्रयास ही नहीं किया।हम भौतिक रूप से अपनी संपन्नता देखते रहे,और अपने कुल के सांस्कृतिक मूल्यों को पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित करने में चूकते गये,फलस्वरूप शास्त्रोक्त यह वैदिक ब्राह्मण कुल दिनों दिन गर्त में मिलता गया और आज तो स्थिति यहाँ तक आ पहुँची है कि हमे बहुलतावादी समाज में निम्न स्तर का माना जाने लगा है।इसके लिए कही न कही हम भी दोषी रहें हैं।यांत्रिक गुणों की संपन्नता के कारण हमने केवल पूर्त कर्मों की तरफ़ ज़्यादा ध्यान दिया और इष्ट कर्मों से अपने मुख मोड़ लिए और इसी में अपने कुल की भलाई समझी। सर्वप्रथम मैं दो पुरातन मुख्य कर्मों की विवेचना कर देना चाहता हूँ,जिससे स्पष्ट हो जाये कि ईष्ट और पूर्त कर्म क्या हैं। 
ईष्ट कर्म वे कर्म होते हैं जिसमें मंत्र उच्चार,यज्ञादि कर्म जैसे साधना उपासना जप तप आदि जो मंत्रों के सहयोग से पूर्ण किये जाते हैं।जैसे गायत्री यज्ञ,वाजपेय यज्ञ,अश्वमेध यज्ञ,शत चण्डी यज्ञ आदि।
पूर्त कर्म जो केवल लोकोपकार के कार्य होते हैं जैसे कूप निर्माण जलाशय खुदवाना, स्थापत्य कला के कार्य,भवन निर्माण,मशीनरी यंत्र के कार्य,बाग बगीचे लगाने के कार्य आदि।जिस पर विश्वकर्मा वंशियों ने ज़्यादा ध्यान दिया जिससे हम जो  कभी यज्ञपति,यज्ञ कराने के   अधिकृत कार्य संपादित करते थे ,उससे कालांतर में विरत होने लगे और इस पर दूसरे वर्गों ने अपना आधिपत्य कर लिया।फलस्वरूप विश्वकर्मा वैदिक कर्म जिसमें ब्रह्म ज्ञान का प्रचार प्रसार का कार्य ,ऋषि कुल कार्य, वेदों की ऋचाएँ पढ़ने पढ़ाने का कार्य,दान देने व दान लेने के कार्य से हमारा कुल धीरे धीरे महरूम होता गया और इस प्रकार हमारी समृद्ध वैदिक सांस्कृतिक परम्परा हमसे कोशो दूर चली गई और आज हम जाजलव्यमान कुल के होते हुए भी हमारी गणना निम्न कुल में होने लगीहै।
यदि हम,अपने कुल को पुनः शिखर पर पहुँचना चाहते है तो हमे भी पुरातन विश्वकर्मा संस्कृति को पुनः स्थान देना पड़ेगा।तभी हमारा कुल अपने चमकते आभा को प्राप्त करने में सफल होगा।
इसके लिए,सर्वप्रथम विश्वकर्मा वंशियों को आंतरिक व बाह्य स्वच्छता पर ध्यान देना होगा, कहते भी हैं कि स्वच्छता देवत्व के निकट है।हम यदि स्वच्छता के साथ रहने लगेंगे तो विश्वास मानिए हम सबकी प्रतिष्ठा अपने आप बढ़नी शुरू हो जाएगी और रोग बीमारी पर होने वाला अनावश्यक खर्च भी कम हो जाएगा।आज प्रत्येक परिवार अस्वच्छता के कारण अपनी गाढ़ी कमाई का ४० प्रतिशत भाग दवा पर खर्च कर रहा है।
वैसे भी कहते है कि,,,,,,जिसका स्वच्छ रहे घर द्वार।
                                        ख़ुशियों का रहता अंबार।।
मित्रों! ग़रीबी ,स्वच्छता में बाधक नहीं है,कोई ये कहता है कि हम ग़रीब है ,कैसे स्वच्छ रहे तो यह ग़लत कथन है।
दूसरी बात,यह कि अपनी आंतरिक स्वच्छता हेतु हमे अपने कुल देवता भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा को अपने पूजा घरों में स्थापित करना होगा ,जिससे उनकी आराधना से हम सभी विश्वकर्मा वंशियों के हृदयों में उस परम पिता के स्मरण मात्र से हम सभी की आंतरिक स्वच्छता बरकरार रहेगी।हमारे सभी विकार उनके पूजा आराधना प्रार्थना से स्वतः समाप्त होने लगेंगे।
पूजा के पश्चात हम सभी को टीका अवश्य लगाने का उपक्रम करना पड़ेगा क्यों?हम सभी चंदन का माथे पर टीका क्यों लगाते है,क्योंकि दोनों भौहों के मध्य ब्रह्म रंध्र ,शक्ति प्रवाह का ज्योति उदगम स्थल ,अतिरिक्त संवेदनशील केंद्र होता है।यह पिनियल ग्रंथि का भी स्थान है,जिसे थर्ड आई या तीसरा नेत्र कह कर पुकारते हैं ।इसे आज्ञा चक्र भी कहते है।यहाँ तिलक लगाने से असीम शांति व मानसिक सजगता प्राप्त होती है।
योग विज्ञान के अनुसार कुल ७२००० नाड़ियाँ फैली हुई है, जिसमें इड़ा,पिंगला, सुषमना) सुषमना आज्ञा चक्र या तीसरे नेत्र के स्थान पर अपनी यात्रा समाप्त करती है, जब कि इड़ा, पिंगला दोनों नेत्रों की कनिकाओं को स्पर्श कर उनकी रक्त वाहिनियाँ तंतु के रूप में परिवर्तित हो जाती हैं,इन दोनों नाड़ियों का सम्बन्ध दोनों आँखों के माध्यम से जाग्रत और स्वप्नावस्था से है।इसके विपरीत सुषमना का सम्बन्ध तीसरे नेत्र के माध्यम से सुषुप्ति, तुरीय,तुरियातित अवस्था से होता है। योगी जन आज्ञा चक्र में चित्त को एकाग्र कर सुषुम्ना मार्ग से इन्हीं अवस्थाओं के द्वारा अन्तर्जगत में प्रवेश करते हैं।यही कारण है माथे पर टीका,तिलक लगाते हैं।
अब हम सभी भी पूजा के बाद चंदन का टीका तिलक लगाना शुरू करे,जिससे समाज में अतिरिक्त पहचान भी बने और शांति भी मिले। तीसरी चीज हमे अपनी वाणी भाषा को मधुर बनाना होगा।
हमें मधुर वाणी बोलने का अभ्यासी बनाना होगा,झूठ फ़रेब अनाचार अत्याचार के मार्ग को छोड़ना पड़ेगा।क्योंकि इससे आयु घटती है। हमें मांसाहार का त्याग करना होगा क्योंकि मांसाहार से सद्वृत्तियां नहीं आ सकती।मन में सदैव उथल पुथल होता है।पृथ्वी का सबसे शक्तिशाली जानवर हाथी होता है,क्या वो मांसाहार करता है?हमे बुरी आदतों को छोड़ना पड़ेगा।नशा,गुटका ,बीड़ी सिगरेट को सदा सदा के लिए त्यागना होगा ,तभी हमारा कुल अपनी खोयी प्रतिष्ठा को प्राप्त करने के योग्य बनेगा।हमे अपने पहनावे पर भी ध्यान देना होगा,क्योंकि ड्रेस हमारे व्यक्तित्व की पहचान होते है,यदि हम किसी धार्मिक आयोजनों में शरीक होवें तो हमे हल्के पीले वस्त्र को धारण करके जाना चाहिए इससे हमारे अंदर धार्मिक भावनाओं का प्रस्फुटन होता है।
अंत में , यदि हम अपने वेश भूषा ,रहन सहन , वाणी भाषा ,परंपराओं ,रीतियों को उपरोक्तानुसार आत्मसात् कर ले, तो सच मानिए हमारी विश्वकर्मा संस्कृति में चार चाँद लगना शुरू हो जाएगा जिसकी आवश्यकता आज महसूस की जा रही है और एक इसी संस्कृति के आधार पर हम अपनी एकता को एक सूत्र में पिरोने में भी कामयाब होंगें।
हम विश्वकर्मा संस्कृति से अपने कुल को संस्कारित कर लोगों के हृदय को शुद्ध बनाने में सफल हो सकेंगें, जिससे इस कुल का रहन सहन, भावना , बुद्धि सभी कुछ उन्नत हो जाएगा, जिससे पीढ़ियों से चली आ रही अविद्या जनित राग द्वेष कुप्रवित्तियाँ आदि धीरे धीरे तिरोहित होने लगेगी और अपना कुल अपनी खोयी प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त कर लेगा।

लेखक: कई पुस्तकों का लेखक, शिक्षाविद, कई राज्य स्तरीय सम्मानों से विभूषित वरिष्ठ साहित्यकार, वार्ताकार, वरिष्ठ प्रशिक्षक एवं प्रथम श्रेणी का पूर्व अधिकारी है।

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