कुपोषण, वैश्विक आबादी में विकसित व विकासशील देशों के लिए एक गंभीर समस्या : डॉ. दयाराम विश्वकर्मा
विश्व में आज करोड़ो बच्चे कुपोषण,अल्पपोषण और अति पोषण के शिकारहैं,जिन्हें जीवित रहने,विकसित होने और पूरी क्षमता के साथ,आगे बढ़ने में,कठिनाई होती है।आज विश्व में 2.6 अरब लोग अभी भी स्वस्थ्य आहार वहन नहीं कर पा रहें हैं।एक अनुमान के अनुसार विश्व के लगभग 8.2प्रतिशत लोग भूख से पीड़ित हैं।20%लोग अफ्रीकी देशों में और लगभग 12.7% लोग एशियाई देशों में आज भी भूख से पीड़ित हैं।
आइए!कुपोषण क्या है?पर ध्यान केन्द्रित करें।कुपोषण एक जटिल स्थिति है,जो कई कारकों के फलस्वरूप उत्पन्न होती है;जिसमें अपर्याप्त आहार का सेवन,खाने की ख़राब गुणवत्ता,स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच में कमी और अन्तर्निहित स्वास्थ्य स्थितियाँ शामिल हैं,जिसका शारीरिक और मानसिक विकास और शरीर के प्रतिरक्षा प्रणाली के काम करने और समग्र स्वास्थ्य पर महत्वपूर्ण प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।बच्चों में कुपोषण के परिणामस्वरूप लम्बे समय तक कमजोर बुद्धि,बिलम्बित संज्ञानात्मक विकास और संक्रामक रोगों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है।समाज पर कुपोषण का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है जैसे- आर्थिक उत्पादकता कम हो जाती है,श्रमिकों की क्षमता,शिक्षा व रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।कुपोषण से बीमारियों और विकलांगता के कारण स्वास्थ्य सेवा की लागत बढ़ जाती है;जिससे व्यक्तियों,परिवारों और समुदायों पर आर्थिक बोझ बढ़ने लगता है,और गरीबी अपना पाँव पसारने लगती हैजिससे परिवार का विकास अवरुद्ध हो जाता है।
कुपोषण को,किसी व्यक्ति के ऊर्जा या पोषक तत्वों के सेवन में कमी,अधिकता या असंतुलन के रूप में परिभाषित किया जाता है।कुपोषण को तीन स्थितियों में वर्गीकृत किया गया है।पहला अल्पपोषण जिसमें बच्चों या व्यक्ति को पोषक तत्वों वाला भोजन नहीं नसीब हो पाता।दूसरा सूक्ष्म तत्वों की आहार में कमी के कारण यह कुपोषण होता है और तीसरे प्रकार का कुपोषण जिसमें अधिक जंक फूड खाने से वजन की अधिकता हो जाती है,जिसे मोटापा या आहार से सम्बंधित कुपोषण की संज्ञा दी जाती है।अधिक पोषण से मोटापा मधुमेह उच्च रक्त चाप मेटाबॉलिक डिसऑर्डर इत्यादि की भी समस्या उत्पन्न हो जाती है।
भारत में 15-49 वर्ष आयु वर्ग में 18.7 प्रतिशत महिलाएं और 16.2 प्रतिशत पुरुष अल्पपोषण से ग्रस्त हैं।यह संख्या 2015 के नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे में 25% थी।
2019-21 के नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 5 वर्ष से कम आयु के 32.1% बच्चे कम वजन वाले,35.5% बच्चे ठिगने(स्टंटेड)और 19.3% बच्चे दुबले पतले(वेस्टेड)पाए गए हैं।
यदि वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो लगभग 22%बच्चे कमजोरी से ग्रस्त हैं और 6.7%बच्चों का वजन उनकी उम्र और ऊँचाई से कम है।और लगभग 5.7%बच्चे मोटापा और अधिक वजन से पीड़ित हैं।यद्यपि दुनिया भर में कुपोषण की स्थिति में सुधार आया है;परन्तु अभी भी विश्व स्वास्थ्य संगठन यूनिसेफ और फ़ूड एण्ड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन के साथ साथ सरकारों को काफ़ी कार्य करने की बहुत ही आवश्यकता है।
यह सुधार इस प्रकार से प्राप्त किया गया कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2015-25 को पोषण पर कार्यवाही का दशक घोषित किया; जिसमें व्यापक रूप से,बच्चों के पोषण हेतु कार्यक्रमों और निवेश के लिए,सुसंगत दृष्टिकोण सम्बद्ध देशों द्वारा अपनाया गया;जिसका परिणाम मातृ एवं बाल पोषण में सुखद प्राप्त हुआ है।लेकिन यूनिसेफ द्वारा 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार 5 वर्ष से कम आयु के अभी भी 42.8 मिलियन बच्चे कुपोषण से पीड़ित हैं।विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट यह भी बताती है कि 5 वर्ष से कम आयु के जो बच्चे मरते हैं उनमें से 50% कुपोषण से मरते हैं।अभी भी वैश्विक समाज को और कारगर ढंग से पोषण के सन्दर्भ में,प्रभावी तरीके अपनाये जाने की आवश्यकता है।
अपने देश भारत ने 8 मार्च 2017 से पोषण मिशन की विधिवत शुरुआत की है;जिसमें मातृ और शिशु स्वास्थ्य पर व्यापक रूप से ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।जिसमें राष्ट्रीय बाल सुरक्षा कार्यक्रम,जननी सुरक्षा योजना,मातृत्व वन्दन योजना इत्यादि प्रमुख है।
भारत सरकार ने 2024 से फोर्टीफाइड चावल उपलब्ध कराने की योजना बनाई है जिससे सूक्ष्म पोषक तत्वों के द्वारा कुपोषण से मुक्ति पाने में मदद मिल रही है।
नैदानिकी पोषण नीति के तहत यूनिसेफ ने वैश्विक आबादी से,कुपोषण समाप्त करने के लिए RUTF जिसे रेडी टू यूज थैरेपेटिक फ़ूड कहते हैं,जिससे बच्चों को उनके स्थान पर ही उक्त पोषण आहार दिया जाता है जिसकी मदद से कुपोषित बच्चों में रिकवरी रेट 90%पाया गया है।इस फ़ूड में मूँगफली का पेस्ट,मिल्क पाउडर,तेल,चीनी मिला होता है,जो बच्चों को काफ़ी टेस्टी भी लगता है और उन्हें कुपोषण से 6-8 सप्ताह में ही निजात मिल जाती है।
फिलीपींस और आसियान देशों का एक हिस्सा”बरंगे न्यूट्रीशन स्कॉलर्स”(BNS)नाम का एक संवर्ग चलाता है,जो कुपोषित बच्चों के परिवार वालों को पोषण शिक्षा, विकास, निगरानी और खाद्य अनुपूरक के सन्दर्भ में, विशेष प्रशिक्षण प्रदान करता है, जिससे लोगों को लाभ प्राप्त हुआ है।
मौजूदा समय में, विश्व के तमाम देश पोषण पर प्रभावी कार्यवाही कर रहे हैं, जिसमे परिवार कल्याण विभाग, जिला कार्यक्रम विभाग अपने आगनबाड़ी केंद्रों की मदद से और प्राइमरी/ माध्यमिक शिक्षा विभाग और स्वास्थ्य विभाग के सहयोग से,कुपोषण से मुक्त होने के लिए प्रयासरत हैं।
यदि हमे कुपोषण को जड़ से समाप्त करना है तो बच्चों को विशेष आहार, संतुलित आहार, चिकित्सीय उपचार के साथ- साथ, सामाजिक और आर्थिक असमानता को दूर करने का भी प्रयास किया जाना समय की माँग है।एक जो बहुत जरूरी पहल की आज आवश्यकता है वो है वैश्विक शांति की जिससे युद्ध के द्वारा बच्चों का भविष्य असुरक्षित ना रहें, इसके साथ ही सभी देशों को जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं पर भी प्रभावी नियंत्रण करने की भी आवश्यकता है, जिससे पूरी दुनिया को राहत मिल सके।
लेखक: कई पुस्तकों का प्रणयनकर्ता, कई सम्मानों से विभूषित, वरिष्ठ साहित्यकार एवं ऑल इंडिया रेडियो का वार्ताकार, मोटिवेशनल स्पीकर, शिक्षाविद और प्रथम श्रेणी का पूर्व अधिकारी है।